This is an Indian Disability Web Portal starting in context to raise awareness about disability and its issues by article wrote up's , Poetry's or Social Awareness Messages in regard to touch all such topics which exclude disability along with suggestion for the inclusion ! Note : All such material posted here just to raise awareness as a part of social responsibility and not to be treated as commercially .
Use Me to Translate Text !
Tuesday, 28 April 2015
Monday, 26 January 2015
Sometimes Reality , Sometimes Story !
बीता बचपन , ना जाने कितनी ही परेशानी में...
कभी रोता , कभी हस्ता , तो कभी करता शैतानी में...
जो आई समझ थोड़ी , तो निकाले कदम बाहर ,
देखे दुनिया , आखिर क्यों इतनी , यह हैरानी में ,
होता यूं तो दर्द , जब भी होता मोसम सर्द ,
हैं जो भी यह यह सांसें, बस किसी की मेहरबानी में ,
सब कुछ हे दिखता धुंधला, अब हर शीशे में जैसे ,
पाऊं अक्स बस अपना , में अब बहते पानी में ,
कभी जब दिल घबराए , या अँधेरा सा दिख जाए ,
बस खुदा के आगे , झुकाऊं अपनी यह पेशानी में ,
ना जुनूँ है कम , और ना होसला कम है ,
कभी हूँ हकीकत , तो कभी हूँ एक कहानी में ......( ~ फैसल )
Friday, 2 January 2015
दुआओं में बोहत ताकत होती है !
माँ ! जब भी वो पल, में याद करता हूँ ,
खुदा से बस दुआ में यही,फरयाद करता हूँ ,
के जो बीती मुझ पर , ना बीते किसी पर भी ,
खुशियों से झोली ,कर कोशिश , सब की आबाद करता हूँ ,
तेरा मन भी बेचैन रहता है वैसे , फ़िक्र में यूं तो मेरी ,
ना जाने किस सोच में , में वक्त बर्बाद करता हूँ ,
करती रहती हैं इंतज़ार , तेरी आँखें , मेरा घर अाने का ,
तेरी हिम्मत और तेरे जज़्बे को , ज़िंदाबाद करता हूँ ,
पर तड़प जाता हूँ , घबरा जाता हूँ , उस भयानक दौर की आहट से ,
फिर छुप जाता हूँ आँचल में तेरे , हवाओं की सनसनाहट से ,
जो चले गए , कहीं दूर , मुझे छोड़ कर , खुदा के घर में ,
है आज भी उनका अक्स , मेरी हर एक नज़र में ,
पर तू ना होना उदास , बस रहना यूं ही मेरे पास ,
तुझे बनाया उस रब ने , बेहद ही कुछ खास ,
अब भी कुछ तकलीफों से , हाँ ! गुज़र तो रहा हूँ,
शैतानियों को कर बंद , पर में सुधर तो रहा हूँ ,
करता हूँ , वायदा तुझसे , के हर दौर से बेखौफ लड़ूंगा,
भुला के सारी पिछली यादें ,फिर से , में आगे बढूंगा ! ( ~ फैसल )
Saturday, 15 November 2014
Whole World Is Fair !
भारतीय अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला , भारत में सालों से नवम्बर माह में दिल्ली के प्रगति मैदान में लगाया जाने वाला , अकेला ऐसा व्यापार मेला है , जो विश्वभर से / में , एक अलग ही दृष्टिकोण से देखा ऒर सराहा जाता है !
हालांकि , दिल्ली के प्रगति मैदान में दिन प्रतिदिन विभिन तरह के मेलों का आयोजन ( जैसे विश्व पुस्तक मेला , हस्तशिल्प मेला , ऑटो मेला आदि ) समय समय पर होता रहता है ,पर दिल्ली का अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला , किसी एक ख़ास वर्ग को ध्यान में ना रख कर , सब तरह के वर्गो को अपनी ओर आकर्षित करता है , चाहे भारत के विभिन राज्यों की सांस्कृतिक झलकियाँ , हस्तशिल्प एवं कलाकीर्तियाँ हों या विभिन तरह की प्रदर्शनियां या बच्चो , निशक्तजन/शारीरिक असक्षम ( विकलांग ) , बुज़ुर्गों , महिलाओं आदि के मनोरंजन के लिए आयोजित कार्यक्रम , सब को ही अपनी ऒर आकर्षित करने में ऒर एक अलग ही समा बांधने में एहम भूमिका निभाते हैं , जिसको देखने के लिए हर वर्ग में , ना सिर्फ एक अलग ही ऊर्जा होती है बल्कि कुछ नया सीखने ओर जानने का , एक अलग ही जज़्बा भी होता है !
यह अकेला ऐसा मंच है , जहाँ से बोहत कुछ सीखा और बोहत कुछ देखा जा सकता है , के आखिर भारत को सांस्कृतिक , धार्मिक ऒर लोकतान्त्रिक दृष्टि से - विश्व भर में सर्वप्रथम क्यों जाना ओर पहचाना जाता है , जिससे प्रभावित होकर विदेशी सैलानी भी , इसको देखने के लिए ना सिर्फ बेहद उत्साहित ऒर प्रफुल्लित होते हैं बल्कि इसको देखने ऒर इसमें शामिल होने के लिए भी , अपनी उपस्तिथि भी दर्ज करवाते हैं ! (~ फैसल )
Saturday, 25 October 2014
Special Abilities Child Have Special Bonding With Special Mother !
माँ , एक ऐसा नाम जिसको कभी मरयम कहा गया , कभी ममता की मूरत , जो अपने हर
बच्चे से अपनी जान से भी ज़्यादा स्नेह करती है , उनके लिए कुछ भी करने को ,
कुछ भी सहने को हमेशा तैयार रहती है , उसका हर बच्चा खुश रहे , वो हमेशा
यही कोशिश करती है , उसके बच्चे को कोई भी तकलीफ हो तो उससे कई ज़्यादा
तकलीफ उसको होती है , हाँ तभी तो माँ को सब धार्मिक किताबों में , एक
अलग ही दर्जा दिया गया है , वो माँ ही तो है , जो अपने से ज़्यादा
अपने बच्चो के बारे में सोचती है , उनके अच्छे के बारे में सोचती है , उनकी
फ़िक्र करती है , अपनी हर दुआ में खुदा से बस उन्ही का ज़िक्र करती है !
पर
ऐसी माँ , जिसका बच्चा बेहद ख़ास है , जिसमें अपना एक एहसास है , जिसके लिए
दुनिया जैसे एक दम अंजानी सी रहती है , उस बच्चे का अपनी माँ /अपनी
वालिदा से लगाओ , उन तमाम बच्चो से बेहद अलग होता है , उसकी सोच बेहद अलग
होती है , क्यूंकि उसकी दुनिया बस उसकी माँ से ही शुरू होती है और माँ पे
ही खत्म , एक छोटी सी कोशिश इस कविता के द्वारा , के आखिर वो बच्चा अपनी
माँ से कितना प्यार करता है और उसको किस तरह का डर हर पल सताता है और
उसकी माँ उसके लिए , उसकी ज़िन्दगी के लिए , कितना एहम मुकाम रखती है !
हाँ माँ ! इसी दुनिया की तो मैंने मुराद की है ,
मेरी झोली जो तूने , खुशियों से आबाद की है ,
पर कभी कभी डरता हूँ में , और आहें भरता हूँ में ,
तू रहे पास हमेशा , बस यही दुआ करता हूँ में ,
जो कभी तू मुझसे , दूर चली जाएगी ,
क्या यह दुनिया , तब मुझे समझ पाएगी ,
जो में सोचना चाहूँ , वो में क्यों सोच नहीं पाता ,
करता हूँ कोशिश पूरी , पर मंज़िल तक पोहंच नहीं पाता ,
उस रब की है अज़ीम नेमत , तेरी तालीम और तेरी नसीहत ,
क़ुर्बान तेरे आगे , सारी दौलत और सारी वसीहत ,
बस तेरे आँचल के साय में ही , तू मुझे हमेशा सुलाना ,
करूँ कितनी भी शैतानी , पर ना तू मुझे भुलाना ,
तेरे पाक क़दमों में ही तो , जन्नत की एक बस्ती है मेरी ,
खुदा के बाद , बस तू ही तो है , तुझसे ही तो बस हस्ती है मेरी....
( ~ faisal )
Monday, 20 October 2014
My Pain is Mine !
वैसे अक्सर यह देखा जाता हे के विकलांगता को कदम कदम पर खुद की उपस्थिति
अथवा खुद की विकलांगता को प्रमाणित करने के लिए , भारतीय समाज में कड़ा
संघर्ष करना पढता हे ! में यहाँ यह ऐसा इस लिए लिख रहा हूँ क्यूंकि किसी की
शारीरिक असक्षमता ( विकलांगता ) को कभी भी किसी स्पष्ट मापदंड पर मापा नहीं
जा सकता , चाहे वो प्रतिशत में हो या किसी बीमारी के रूप में ,
हर विकलांगता या शारीरिक विकार के पीछे अपनी ही एक चुनौती और दर्द छिपा
होता है !
बात अगर बुज़ुर्गों की करें तो उनको उनकी ढलती उम्र ,
उनके बालों के रंग तथा उनकी त्वचा पे पढ़ती झुर्रियों से कुछ हद तक उनकी
पहचान करना आसान होती हे जो विकलांगता पे शायद लागू नहीं होती , कई बार
देखा गया हे के विकलांग व्यक्तयों के संधर्ब में लोगों की एक अलग ही धारणा ,
एक अलग ही दृष्टिकोण होता है , जिसमें विकलांग व्यक्तयों के साथ
अशोभनीय व्यवहार , तथा मानसिक वा शारीरिक उत्पीड़न वा भेदभाओ भी शामिल
है !
ऐसा कई बार चर्चा का विषय बना के शारीरिक तौर पर विकलांग
व्यक्तयों को कभी उनसे उनकी ही विकलांगता का प्रमाण माँगा जाता हे , कभी
मेट्रो ट्रेनों के लिए बने स्टेशनों की लिफ्ट्स ( जहाँ यह साफ़ साफ़ लिखा
होता है के " लिफ्ट केवल बीमार व्यक्तयों के लिए तथा विकलांग या बुज़ुर्गों
के लिए है ) को लेकर सक्षम व्यक्तयों द्वारा बेरुखी दिखाई जाती हे , तो
कभी सीट / या किसी और दिक्कत को लेकर , उनसे ना चल पाने / ना बोल पाने /
ना दिख पाने / ना सुन पाने का प्रमाण माँगा जाता हे !
दरअसल
यह कुछ ऐसे अनछुए पहलूँ हैं , जिससे सक्षम व्यक्तयों का एक बोहत बड़ा तबका, आज भी अनजान
हैं , और जाने अनजाने में , कुछ ऐसी गलती कर जाते हैं , जो कहीं ना कहीं
एक कमज़ोर वर्ग को , ओर कमज़ोर बनाने में एहम भूमिका निभाती है !
हाँ
, हम सिर्फ यही आशा कर सकते हैं , के अच्छे दिन , एक दिन हर
व्यक्ति के लिए ज़रूर आयंगे , जब कोई भी कमज़ोर नहीं होगा , जहाँ कोई भी
भेदभाओ या बेरुखी नहीं होगी , जहाँ होंगे सब ही बस अपने , जहाँ होंगे पूरे सब के ही सपने !
कुछ लोगों
को , क्यों हे ऐसा लगता ,
के में भी हूँ , उनके ही जैसे चल सकता ,
जो में बोल
ना पाऊं , जो में सुन ना पाऊँ ,
हैं कुछ बंदिशें
, आखिर में कैसे समझाऊं ,
भले ही मुझको
यूं तो , दिखता नहीं है ,
भले ही संग मेरे , कोई फरिश्ता नहीं है ,
पर पा ही
लेता हूँ , में भी मंज़िल अपनी ,
थम हाथ उनका
, जिनसे मेरे कोई रिश्ता नहीं है ,
कमज़ोर हैं बाहें
, फिर भी मज़बूत पकड़ बनाऊं ,
खुद भी हूँ
हस्ता यूं तो , और दूजो को भी हसाउँ ,
हर कोई है वैसे , यहाँ
दुखों का मारा ,
है कोई अकेला
, तो कोई है बेसहारा ,
ख्वाहिश है
यही मेरी , है दुआ यही मेरी
,
ना रहे दुनिया , अब किसी की भी अँधेरी ...
ना रहे दुनिया , अब किसी की भी अँधेरी ...
Sunday, 3 August 2014
Disability is a Kind of Friendly Relation and Nothing ! HAPPY FRIENDSHIP DAY 2014
ज़िन्दगी को जीना , तुमसे ही तो हे सीखा ,
भले ही रहा सफर , कभी मीठा , तो कभी तीखा ,
चले गए थे कुछ लोग , जब तन्हा छोड़ कर ,
बेवजह , कुछ ज़ख्म देकर , और दिल को तोड़ कर ,
गया था मर सा जैसे तब और लड़ रहा था , अपनी हर एक परेशानी से ,
आई थी जैसे रूह में जान दुबारा तब , तुम्हारी ही मेहरबानी से ,
वो तुम ही तो थे , जो ' दोस्त ' की तरह आए , तब एक फरिश्ता बन कर ,
वो तुम ही तो थे , जो खुशियाँ लाए , तब एक नायाब रिश्ता बन कर !
~ फैसल

Subscribe to:
Posts (Atom)





